सीमा मेहता ने पारंपरिक गेहूं की खेती छोड़कर आधुनिक पॉलीहाउस में जरबेरा की खेती शुरू की, जिससे उनकी वार्षिक आय 25.20 लाख रुपये तक पहुंच गई
सही समय पर प्राप्त अनुदान और तकनीकी सहायता ने उन्हें एक सफल उद्यमी बनने में मदद की।
मेहनत, लगन और कुछ नया करने का हौसला हो, तो खेती भी सफलता और समृद्धि का मजबूत माध्यम बन सकती है। सीहोर जिले के बमूलिया गांव की रहने वाली सीमा मेहता ने इसे अपनी मेहनत से साबित कर दिखाया है। वर्षों तक पारंपरिक गेहूं की खेती करने वाली सीमा अब आधुनिक तकनीक से जरबेरा फूलों का उत्पादन कर अच्छी आय अर्जित कर रही हैं। उनकी यह सफलता न केवल उनके परिवार के लिए आर्थिक मजबूती लेकर आई है, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। सीमा मेहता पहले अपनी भूमि पर गेहूं की खेती करती थीं, जिससे उन्हें लगभग 15 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता था। खेती में 10 हजार रुपये की लागत लगाने के बाद उन्हें करीब 29 हजार रुपये का शुद्ध लाभ मिलता था। हालांकि इससे परिवार का भरण-पोषण हो रहा था, लेकिन उनकी इच्छा खेती से आय बढ़ाने और कुछ नया करने की थी। वर्ष 2024-25 में सीमा मेहता को उद्यानिकी एवं संरक्षित खेती योजना की जानकारी मिली। उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाते हुए सरकार से 16.88 लाख रुपये का अनुदान प्राप्त किया और 4,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में आधुनिक पॉलीहाउस स्थापित किया। पॉलीहाउस की स्थापना के बाद, उन्होंने पारंपरिक गेहूं की फसल के स्थान पर उच्च मूल्य वाले जरबेरा फूलों की खेती शुरू करने का निर्णय लिया। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव था जिसने उनकी कृषि आय को बढ़ाने की क्षमता रखी। पॉलीहाउस तकनीक ने फसल को मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने और बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह तकनीक किसानों को नियंत्रित वातावरण में खेती करने की सुविधा देती है, जिससे फसल की गुणवत्ता और उपज दोनों में सुधार होता है। सीमा मेहता ने इस तकनीक का प्रभावी ढंग से उपयोग किया। सीमा मेहता की मेहनत और आधुनिक पॉलीहाउस तकनीक का सकारात्मक परिणाम जल्द ही सामने आया। वर्ष 2026-27 के उत्पादन काल तक उनके पॉलीहाउस से प्रतिवर्ष लगभग 3.60 लाख जरबेरा फूलों का उत्पादन होने लगा। यह उनकी पारंपरिक खेती से एक बड़ी छलांग थी, जिसने उनकी आय क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया। उत्पादन पर करीब 13.60 लाख रुपये की लागत आई, जिसके बाद उनकी वार्षिक आय 25.20 लाख रुपये तक पहुंच गई। इस प्रकार, उन्हें लगभग 11.60 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। यह आंकड़ा पारंपरिक खेती से प्राप्त लाभ की तुलना में कहीं अधिक है, जो आधुनिक तकनीक की प्रभावशीलता को दर्शाता है। पारंपरिक खेती से आधुनिक फूलों की खेती तक का उनका यह सफर यह दर्शाता है कि सही मार्गदर्शन, आधुनिक तकनीक और कड़ी मेहनत से कृषि को एक अत्यंत लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है।



