फ्रांस में स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब आगजनी और लूटपाट तक पहुंच गया है। यह स्थिति वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण बढ़ी आर्थिक विषमताओं का परिणाम है, जिसने अमीरी-गरीबी की खाई को और गहरा कर दिया है। व्यापारिक केंद्रों के अभिजात्य वर्ग के स्कूल-कॉलेज तो फल-फूल रहे हैं, लेकिन सरकारी अनुदान पर चलने वाले शिक्षण संस्थान बदहाल हैं। यह विश्वव्यापी विषमता और आक्रोश का मूल कारण है। लोकतांत्रिक सरकारों की कल्याणकारी नीतियों की जगह मुनाफे पर आधारित व्यवस्था ने ले ली है, जिसमें राजनेताओं और सत्ता से जुड़े लोगों की शैक्षणिक संस्थानों के मुनाफे में भागीदारी ने स्थितियों को और विकट बना दिया है। सत्ताधीशों की विलासिता बरकरार है, जबकि आम जनता चौतरफा आर्थिक दबाव झेल रही है। कोरोना महामारी ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया और लाखों रोजगार खत्म कर दिए। इससे उबरने की कोशिश में ही रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित किया। इसके बाद इस्राइल-हमास संघर्ष और अमेरिका द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध ने दुनिया भर में ईंधन संकट खड़ा कर दिया। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने से ईंधन की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई और महंगाई बढ़ गई, जिससे सामाजिक असंतोष पनपा। सुनहरे भविष्य के सपने देखने वाली युवा पीढ़ी की आशाओं पर इस संकट ने पानी फेर दिया, शिक्षा महंगी हो गई और रोजगार के अवसर सिमट गए। महाशक्तियों की निरंकुश नीतियों ने दुनिया भर में लोगों के जीवन को कष्टकारी बना दिया है, जिससे भविष्य की आशंकाओं से युवा आक्रोशित हैं। यूरोप के जिन देशों में फिलहाल आक्रोश की लहरें दिख रही हैं, उनके मूल में केवल युवाओं का गुस्सा ही नहीं है।
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आर्थिक विषमता से उपजा आक्रोश: फ्रांस से यूरोप तक भड़की हिंसा
21 अक्टूबर 2026 को 10:46 pm बजे

आर्थिक विषमता से उपजा आक्रोश: फ्रांस से यूरोप तक भड़की हिंसा
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