पांच प्रमुख कुंड-घाट प्रोजेक्ट में से केवल मालीखेड़ी का कुंड तैयार हो सका, बाकी चार विभिन्न कारणों से अटके
विसर्जन की तैयारी अधूरी
राजधानी भोपाल में मूर्तियों के विसर्जन के लिए नगर निगम ने पिछले चार सालों में 47.50 करोड़ रुपये मंजूर किए, लेकिन पांच प्रमुख कुंड-घाट प्रोजेक्ट में से केवल मालीखेड़ी का कुंड ही बनकर तैयार हो पाया है। बाकी चार महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट जमीन पर कब्जा न मिलने, प्रशासनिक आपत्तियों, काम का दायरा बढ़ने और टेंडर प्रक्रिया पूरी न होने जैसी वजहों से अटके हुए हैं। पिछले महीने गणेशोत्सव के दौरान उम्मीद थी कि कुछ घाट तैयार हो जाएंगे, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका। अब दुर्गा पूजा के विसर्जन का कार्य भी पुराने घाटों पर ही संपन्न होगा। भोपाल और इसके आसपास के इलाकों से हर साल 7 हजार से अधिक छोटी और बड़ी मूर्तियों का विसर्जन नगर निगम के घाटों पर होता है। नए कुंडों का निर्माण न होने के कारण इस बार भी इन मूर्तियों के विसर्जन का सारा दबाव पुराने 7 घाटों पर ही पड़ेगा। नगर निगम की योजना थी कि करोंद, बायपास और नर्मदापुरम रोड जैसे शहर के बाहरी इलाकों में नए कुंड बनाकर विसर्जन का भार अलग-अलग क्षेत्रों में बांटा जाए। इससे वीआईपी रोड और पुराने शहर में ट्रैफिक जाम की समस्या कम होती और साथ ही तालाबों में सीधे विसर्जन से होने वाले प्रदूषण को भी नियंत्रित किया जा सकता था। हालांकि, अधिकांश प्रोजेक्ट अधूरे होने की वजह से विसर्जन का कार्य इस वर्ष भी पुराने घाटों और जलाशयों के भरोसे ही रहेगा। दो महीने पहले नगर निगम परिषद की बैठक में वार्ड-3 के पार्षद अशोक मारण ने इस मुद्दे को उठाया था।
संतोष गुप्ता, अधीक्षण यंत्री, झील संरक्षण प्रकोष्ठ, नगर निगम ने कहा है कि वे पूर्व में कुंड-घाटों के लिए स्वीकृत हुई राशि और काम की वर्तमान स्थिति की विस्तृत जानकारी मंगवाएंगे। उन्होंने बताया कि किस प्रोजेक्ट पर कितना काम हुआ है, इसकी जांच के बाद ही वे स्थिति स्पष्ट कर पाएंगे। यह स्थिति शहर में मूर्तियों के विसर्जन के लिए नगर निगम की तैयारियों की असलियत बयां करती है।
पुराने घाटों पर बढ़ती भीड़ और मूर्तियों की संख्या से जल निकायों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने की आशंका है। खासकर गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहारों के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाती है। निगम की योजनाएं धरातल पर उतरने में विफल साबित हो रही हैं, जिसका सीधा असर शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है। प्रशासनिक आपत्तियों और जमीन पर कब्जे की समस्या जैसे मुद्दे प्रोजेक्ट्स में देरी के मुख्य कारण बताए जा रहे हैं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो।

