मध्य प्रदेश की शराब में 21% तक कम अल्कोहल, आबकारी विभाग की जांच पर सवाल
मध्य प्रदेश में देशी शराब की बोतलों में निर्धारित अल्कोहल की मात्रा से 21% तक कम पाया गया है। जून 2026 में भोपाल की सीईएस एनालिटिकल एंड रिसर्च सर्विसेज लैब में हुई जांच में यह खुलासा हुआ। प्रदेश की 3 डिस्टिलरियों से लिए गए 5 नमूनों में अल्कोहल की मात्रा तय मानक से काफी कम निकली। यह रिपोर्ट जून में ही आबकारी अधिकारियों को सौंप दी गई थी, लेकिन उन्होंने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे सवाल उठ रहे हैं। सबसे अधिक 20.74% अल्कोहल की कमी सागर की डीसीआर डिस्टिलरीज के नमूने में पाई गई। इस गंभीर गड़बड़ी से यह सवाल खड़ा होता है कि यदि शराब बनाने में कम स्पिरिट का इस्तेमाल हुआ है, तो बची हुई स्पिरिट कहां गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की मिलावट से डिस्टिलरियों को करोड़ों रुपये का मुनाफा हो सकता है। आबकारी विभाग के पूर्व डिप्टी कमिश्नर विनोद रघुवंशी के अनुसार, यदि 1 लाख लीटर प्लेन शराब को तय 28.55% स्ट्रेंथ पर बनाया जाए, तो इसमें 28,550 लीटर शुद्ध अल्कोहल की आवश्यकता होती है। वहीं, यदि यही शराब 24.72% स्ट्रेंथ पर तैयार की जाए, तो केवल 24,720 लीटर अल्कोहल की जरूरत पड़ेगी। इससे 3,830 लीटर शुद्ध अल्कोहल का अंतर आ जाता है, जो करीब 6,434 प्रूफ लीटर के बराबर है। रघुवंशी ने आगे बताया कि स्पिरिट की बचत से उत्पादन लागत में कमी आती है। उनके आकलन के मुताबिक, 200% ड्यूटी के आधार पर प्रति 4.50 प्रूफ लीटर पर सरकार को 1,200 रुपये का नुकसान हो सकता है, जबकि डिस्टिलरी को 200 रुपये का फायदा होने की संभावना है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह गणना उदाहरण के तौर पर की गई है। वास्तविक आर्थिक प्रभाव संबंधित बैचों के उत्पादन, स्पिरिट की खपत और ड्यूटी रिकॉर्ड के विस्तृत मिलान के बाद ही पता चलेगा। निजी लैब में जांच के लिए कारोबारियों द्वारा उपलब्ध कराए गए नमूनों का परीक्षण किया गया था। इसलिए यह पता लगाना अत्यंत आवश्यक है कि संबंधित बैचों की बॉटलिंग के समय उनकी स्ट्रेंथ कितनी दर्ज की गई थी।

