मोह-माया त्यागने का उपदेश देने वाले साधु-संत अब धन-संपत्ति बढ़ाने और जमीनों पर अवैध कब्जा करने में लगे हैं, ऐसी चिंता उज्जैन में जताई गई है। मठों और आश्रमों के लिए सरकारी पैसा मांगा जा रहा है, वहीं साधु-संतों द्वारा धन संग्रह कर व्यापार चलाने तथा सरकारी भूमियों पर अतिक्रमण को अनुचित बताया जा रहा है। अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने इस गंभीर मुद्दे पर देश के 2 बड़े धर्माचार्यों से राय मांगी है। महासंघ ने सनातन धर्म के त्योहारों के स्वरूप में आ रहे बदलावों, परंपराओं के उल्लंघन और अन्य धार्मिक विषयों पर भी चिंता जताते हुए जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज तथा बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को पत्र लिखकर शास्त्रीय समाधान मांगा है। महासंघ के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. महेश पुजारी द्वारा भेजे गए इस पत्र में संतों की कार्यशैली और धार्मिक आयोजनों की प्रामाणिकता को लेकर मुख्य बिंदु उठाए गए हैं। महासंघ ने विशेष रूप से सिंहस्थ जैसे आयोजनों के दौरान मठ-आश्रमों के लिए सरकारी सहायता मांगने, संतों द्वारा धन संग्रह कर व्यापार चलाने तथा सरकारी भूमियों पर अतिक्रमण करने जैसी गतिविधियों को अनुचित बताया है। इसी संदर्भ में, जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज तथा बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से इस पर अपना रुख स्पष्ट करने का आग्रह किया गया है। पत्र में उज्जैन के स्थानीय संतों-महामंडलेश्वरों द्वारा रावण दहन जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान पर कोई स्पष्ट जवाब न दे पाने की स्थिति पर भी टिप्पणी की गई है। यह दर्शाता है कि धार्मिक परंपराओं और उनके औचित्य को लेकर समाज में एक प्रकार की अनिश्चितता बनी हुई है, जिसे दूर करने की आवश्यकता है। अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने देश के इन दोनों प्रमुख धर्माचार्यों से इन जटिल विषयों पर शास्त्रीय मत जारी करने का आग्रह किया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सनातन धर्म की सही और प्रामाणिक जानकारी आम जनमानस तक पहुंचे। वर्तमान समय में धार्मिक विषयों पर अनेक प्रकार की भ्रांतियां फैल रही हैं, जिनके कारण श्रद्धालु भ्रमित हो सकते हैं। ऐसे में, प्रतिष्ठित धर्माचार्यों का स्पष्ट मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यह पहल सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने और उसकी मूल शिक्षाओं को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। धर्माचार्यों से पूछे गए प्रमुख सवालों में गणेश उत्सव से संबंधित है, जिसमें गणेश स्थापना से विसर्जन तक की सही शास्त्रीय प्रमाणिकता के बारे में पूछा गया है। यह सवाल इस बात पर प्रकाश डालता है कि किस प्रकार वर्तमान में गणेश उत्सव मनाने की विधियों में भिन्नता आ गई है और इसके मूल शास्त्रीय आधार पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। समाज इन परंपराओं के सही स्वरूप को जानना चाहता है, ताकि वे बिना किसी दुविधा के धार्मिक अनुष्ठानों का पालन कर सकें। यह प्रश्न धार्मिक विधियों के मानकीकरण और उनके ऐतिहासिक संदर्भ को समझने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसी क्रम में, दुर्गा नवरात्रि (गरबा) के संबंध में भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा गया है। इसमें नवरात्रि के दौरान गरबा खेलने की प्रथा कितने दिनों तक होनी चाहिए, इस पर स्पष्टता मांगी गई है। गरबा, नवरात्रि का एक अभिन्न अंग बन गया है, लेकिन इसकी अवधि और शास्त्रीय औचित्य पर अक्सर बहस होती रहती है। महासंघ चाहता है कि इस पर धर्माचार्यों का मत स्पष्ट हो, ताकि धार्मिक परंपराओं का निर्वहन सही ढंग से किया जा सके। यह प्रश्न धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन में एकरूपता लाने और उनके सांस्कृतिक महत्व को समझने की दिशा में एक प्रयास है। सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रश्नों में से एक रावण दहन से संबंधित है। महासंघ ने रावण वध की तिथि, रावण दहन का शास्त्रीय आधार तथा दुर्योधन-दुशासन के कुकृत्यों की तुलना में केवल रावण दहन के औचित्य पर स्पष्टता मांगी है। यह प्रश्न पौराणिक कथाओं के पात्रों और उनकी घटनाओं की व्याख्या को लेकर समाज में चल रही विभिन्न धारणाओं पर आधारित है। इस पहल से धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं में एकरूपता आने की उम्मीद है।
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साधु-संतों के आचरण पर 2 धर्माचार्यों से मांगी राय
24 अक्टूबर 2026 को 11:00 pm बजे

साधु-संतों के आचरण पर 2 धर्माचार्यों से मांगी राय
