सागर जिले के पुरव्याऊ टौरी में 122 सालों से चली आ रही है मां काली को कंधों पर बिठाकर स्थापना और विसर्जन की अनोखी परंपरा
पूरा शहर जयकारों से गूंजता है, आसपास के जिलों से भी आते हैं श्रद्धालु
सागर जिले के पुरव्याऊ टौरी पर कांधे वाली काली की स्थापना 122 सालों से चली आ रही एक अनूठी परंपरा है। यह प्रथा वर्ष 1905 में, यानी आजादी से भी पहले, अंग्रेजी शासनकाल के दौरान हीरासिंह राजपूत द्वारा शुरू की गई थी। खास बात यह है कि भक्त मां दुर्गा को स्थापना के लिए पंडाल तक अपने कंधों पर उठाकर लाते हैं और विदाई के समय विसर्जन के लिए भी मां भक्तों के कंधों पर ही सवार होकर निकलती हैं। इस दौरान जुलूस में सबसे आगे मशाल (पलीता) जलाई जाती है। आयोजकों का कहना है कि अंग्रेजी शासनकाल में वाहनों की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, इसलिए उनके पूर्वज मां को विसर्जन के लिए कंधों पर ले जाते थे। तभी से यह परंपरा चली आ रही है और आज भी अनवरत जारी है। उस समय बिजली न होने के कारण उजाले के लिए मशाल का इस्तेमाल किया जाता था, जो अब भी विसर्जन जुलूस का हिस्सा है। नवरात्र के नौ दिनों में हजारों की संख्या में भक्त माता के दर्शन के लिए प्रतिदिन पहुंचते हैं। सार्वदेशिक दुर्गा महोत्सव समिति पुरव्याऊ टौरी के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह राजपूत ने बताया कि आजादी से पहले 1905 में हीरासिंह राजपूत ने पुरव्याऊ टौरी पर पहली बार मां की स्थापना की थी। तब से लेकर आज तक 122 वर्षों से यह परंपरा अनवरत रूप से जारी है। यहां मां महिषासुर मर्दिनी के रूप में देवी की स्थापना की जाती है, जिनके साथ भगवान गणेश, महालक्ष्मी, मां सरस्वती और भगवान कार्तिकेय भी विराजते हैं। स्थापना के लिए मां भक्तों के कंधों पर बैठकर आती हैं और दशहरा पर विसर्जन चल समारोह के दौरान भी भक्त उन्हें कंधों पर लेकर निकलते हैं। इस दौरान पूरा शहर 'चल माई काली माई' के जयकारों से गूंज उठता है।
आयोजकों का कहना है कि आजादी से पहले बिजली की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए माता की स्थापना के समय उनके सामने रोशनी के लिए पलीता जलाया जाता था। माता को विसर्जन के लिए ले जाते समय भी वही पलीता आगे-आगे चलता था। तभी से यह परंपरा शुरू हुई जो आज भी जारी है। इस अनूठी परंपरा का निर्वहन सार्वदेशिक दुर्गा महोत्सव समिति पुरव्याऊ टौरी द्वारा किया जाता है।
मां की मूर्ति का श्रृंगार 'मां अभव्या' परिवार के सदस्य करते हैं, जिसमें 122 साल पुराना परंपरागत पायजेब और मराठी साड़ी का उपयोग होता है। हजारों की संख्या में भक्त नौ दिनों तक माता के दर्शन के लिए उमड़ते हैं, और दशहरा पर विसर्जन जुलूस में शामिल होते हैं। विसर्जन जुलूस में मां को कंधों पर बिठाकर ले जाया जाता है, और आगे मशाल (पलीता) जलती है।




