शाम 4 बजे निकली शाही सवारी
विजयदशमी के पावन अवसर पर मंगलवार को उज्जैन में बाबा महाकालेश्वर की शाही सवारी बड़े ही धूमधाम से निकाली गई। शाम 4 बजे मंदिर के सभामंडपम में विशेष पूजन-अर्चना के बाद, भगवान मनमहेश के स्वरूप को चांदी की पालकी में विराजमान किया गया। यह सवारी शहर के सात किलोमीटर लंबे पारंपरिक मार्ग से होते हुए दशहरा मैदान तक पहुंची, जहां शमी वृक्ष का विधि- विधान से पूजन किया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। पूरे मार्ग में भक्तों के दर्शन के लिए 100 से अधिक मंच बनाए गए थे, जहाँ से लोग बाबा के दर्शन कर रहे थे। विशेष आकर्षण का केंद्र बने ड्रोन, जिनसे 500 फूल भी बरसाए गए। यह नज़ारा अत्यंत मनमोहक था और इसने सवारी में एक नई ऊर्जा भर दी। जैसे ही सवारी फ्रीगंज पहुंची, ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं इंद्रदेव ने महाकालेश्वर का अभिषेक किया हो। यह वर्ष में केवल एक बार विजयादशमी के दिन ही होता है जब महाकालेश्वर की सवारी नए शहर में निकाली जाती है, जो भक्तों के लिए एक अनूठा अनुभव होता है। इस बार की सवारी में कई अनूठी झलकियाँ देखने को मिलीं। 5 जनजातीय समूहों ने अपने मनमोहक लोकनृत्यों से समां बांध दिया, जिसने पारंपरिकता और आधुनिकता का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। 2 पुलिसकर्मियों की कड़ी सुरक्षा के बीच, महाकालेश्वर के बैंड ने मधुर भजनों की प्रस्तुति दी, जो श्रद्धालुओं को भक्तिमय संगीत की लहरों में सराबोर कर रहे थे। यह सब मिलकर एक अविस्मरणीय दृश्य बना रहा था, जहाँ आस्था और उत्सव का संगम था। सवारी के दौरान 5 चलित रथों से सीधा प्रसारण भी किया जा रहा था, ताकि दूर-दराज के भक्त भी इस भव्य आयोजन का हिस्सा बन सकें। इन रथों के माध्यम से लाइव स्ट्रीमिंग ने लाखों लोगों को घर बैठे ही बाबा महाकालेश्वर के दर्शन का सौभाग्य प्रदान किया। यात्रा के दौरान 1 झांकी विशेष रूप से प्रदर्शित की गई, जिसमें 84 महादेव के दर्शन हो रहे थे। यह झांकी भगवान शिव के विभिन्न रूपों और उनके महत्व को दर्शा रही थी, जिसने भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। महाकालेश्वर की यह सवारी न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह उज्जैन की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। हर साल विजयादशमी पर निकाली जाने वाली यह सवारी शहरवासियों और श्रद्धालुओं के लिए आस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इस वर्ष की सवारी ने अपनी भव्यता, व्यवस्था और अनूठे आकर्षणों से सभी का मन मोह लिया।
